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फ्यूचर्स ट्रेडिंग क्या है? परपेचुअल, फंडिंग और लीवरेज

लेखक TradeCookbook Editorialप्रकाशित August 6, 2026
कठिनाई
Beginner
समय
1 मिनट

हम कैसे परखते हैं

सीधा जवाब
फ्यूचर्स एक कॉन्ट्रैक्ट है जिसकी कीमत किसी क्रिप्टो के भाव के साथ चलती है — कॉइन आपके पास कभी आता ही नहीं। क्रिप्टो में सबसे ज़्यादा चलने वाला रूप परपेचुअल फ्यूचर्स है, जिसकी कोई एक्सपायरी नहीं होती और जो फंडिंग रेट के ज़रिए स्पॉट भाव के पास बना रहता है। फ्यूचर्स से आप गिरते बाज़ार में भी कमा सकते हैं और लीवरेज ले सकते हैं — लीवरेज मुनाफ़ा और नुक़सान दोनों बढ़ाता है, इसलिए पोज़ीशन साइज़ और लिक्विडेशन समझना सबसे ज़रूरी है। यह शैक्षिक जानकारी है, निवेश सलाह नहीं।
इस पेज पर

फ्यूचर्स ट्रेडिंग में आप किसी क्रिप्टोकरेंसी का भाव ट्रेड करते हैं — ऊपर जाए तो भी, नीचे जाए तो भी — बिना वह कॉइन ख़रीदे। क्रिप्टो में इसका एक ही रूप सबसे ज़्यादा चलता है: परपेचुअल फ्यूचर्स, जिसकी कोई एक्सपायरी नहीं होती।

यह पेज बताता है कि फ्यूचर्स असल में क्या है, परपेचुअल, फंडिंग और लीवरेज कैसे काम करते हैं, और पहला ट्रेड लगाने में क्या-क्या शामिल है। (यह शैक्षिक जानकारी है, निवेश सलाह नहीं।)

फ्यूचर्स ट्रेडिंग क्या है?

फ्यूचर्स भविष्य की क़ीमत को लेकर किया गया एक कॉन्ट्रैक्ट है। क्रिप्टो फ्यूचर्स का मूल्य किसी कॉइन — मान लीजिए बिटकॉइन — के साथ चलता है, यानी भाव बदलने पर आपको फ़ायदा या नुक़सान होता है, जबकि बिटकॉइन आपके पास होता ही नहीं।

सीधे ख़रीदने से इसे दो चीज़ें अलग करती हैं:

  • आप शॉर्ट जा सकते हैं। लॉन्ग में भाव चढ़ने पर मुनाफ़ा होता है, शॉर्ट में गिरने पर। स्पॉट में आप असल में सिर्फ़ चढ़ने पर दाँव लगा सकते हैं, फ्यूचर्स में दोनों तरफ़।
  • आप लीवरेज ले सकते हैं। पोज़ीशन की पूरी क़ीमत का एक हिस्सा मार्जिन के रूप में जमा करते हैं, और छोटी रकम से बड़ी पोज़ीशन चलती है। इससे नतीजा कई गुना हो जाता है — दोनों दिशाओं में।

परपेचुअल फ्यूचर्स और फंडिंग रेट

पारंपरिक फ्यूचर्स किसी तय तारीख़ पर ख़त्म होते हैं। परपेचुअल नहीं होते — इसीलिए क्रिप्टो में इनका चलन इतना ज़्यादा है।

पर एक दिक़्क़त है: अगर कॉन्ट्रैक्ट कभी सेटल ही नहीं होता, तो उसका भाव असली बाज़ार से भटक सकता है। इसे रोकने के लिए फंडिंग रेट है — लॉन्ग और शॉर्ट के बीच होने वाला छोटा भुगतान, जो आम तौर पर हर कुछ घंटे में होता है।

  • परपेचुअल का भाव स्पॉट से ऊपर हो, तो लॉन्ग शॉर्ट को भुगतान करते हैं।
  • भाव स्पॉट से नीचे हो, तो शॉर्ट लॉन्ग को भुगतान करते हैं।

यह एक्सचेंज की फीस नहीं है — पैसा ट्रेडरों के बीच जाता है, एक्सचेंज के पास नहीं। पर पोज़ीशन कई दिन खुली रखने पर यह जुड़कर काफ़ी बड़ी लागत बन सकती है।

लीवरेज और मार्जिन

लीवरेज को यूँ देखिए: 10x पर ₹10,000 के मार्जिन से ₹1,00,000 की पोज़ीशन चलती है।

  • भाव 5% चढ़े → पोज़ीशन पर ₹5,000, यानी आपके मार्जिन पर 50% मुनाफ़ा।
  • भाव 5% गिरे → वही ₹5,000 नुक़सान, यानी मार्जिन का आधा साफ़।

यहीं लिक्विडेशन आता है। भाव आपके ख़िलाफ़ इतना चला जाए कि मार्जिन नुक़सान सहने लायक़ न बचे, तो एक्सचेंज पोज़ीशन ख़ुद बंद कर देता है और जमा मार्जिन चला जाता है। लीवरेज जितना ऊँचा, लिक्विडेशन उतना पास — 10x पर भाव का लगभग 10% आपके ख़िलाफ़ जाना ही काफ़ी हो सकता है।

नए ट्रेडर सबसे बड़ी ग़लती यही करते हैं कि लीवरेज को मुनाफ़ा बढ़ाने का बटन समझ लेते हैं। असल में यह जोखिम बढ़ाने का बटन है, और मुनाफ़ा उसके साथ आने वाला साइड इफ़ेक्ट है।

क्रॉस और आइसोलेटेड मार्जिन

  • आइसोलेटेड मार्जिन — जोखिम सिर्फ़ उस एक पोज़ीशन के मार्जिन तक सीमित रहता है। वही पोज़ीशन लिक्विडेट होगी, बाक़ी बैलेंस सुरक्षित।
  • क्रॉस मार्जिन — अकाउंट का पूरा बैलेंस पोज़ीशन को सहारा देता है। लिक्विडेशन दूर खिसक जाता है, पर हो गया तो नुक़सान बहुत बड़ा हो सकता है।

सीखने के दौर में आइसोलेटेड ज़्यादा समझदारी भरा है — नुक़सान की ऊपरी सीमा पहले से पता होती है।

पहला ट्रेड लगाने में क्या शामिल है

  1. ऐसा एक्सचेंज चुनें जो आपके देश में सेवाएँ देता हो और डेरिवेटिव सपोर्ट करता हो।
  2. KYC पूरा करें और फंड डालें।
  3. स्पॉट से डेरिवेटिव वॉलेट में मार्जिन ट्रांसफ़र करें।
  4. कम लीवरेज चुनें और आइसोलेटेड मार्जिन रखें।
  5. पोज़ीशन का साइज़ इस हिसाब से तय करें कि पूरा नुक़सान होने पर भी वह रकम आप खो सकते हों।
  6. ऑर्डर लगाने के साथ ही स्टॉप-लॉस लगाएँ, बाद में नहीं।

पहला ट्रेड सबसे छोटे साइज़ पर करें जो एक्सचेंज देता है। मक़सद कमाना नहीं, यह देखना है कि सिस्टम असल में कैसे बर्ताव करता है।

जोखिम की सच्ची तस्वीर

लीवरेज वाली ट्रेडिंग में ज़्यादातर रिटेल ट्रेडर पैसा गँवाते हैं। बाज़ार बीच में इतना भी बदल सकता है कि आपकी दिशा आख़िर में सही निकले, फिर भी रास्ते में लिक्विडेशन हो जाए — दिशा सही होना काफ़ी नहीं होता, टिके रहना पड़ता है।

अगर आप अभी शुरुआत कर रहे हैं, तो व्यावहारिक सलाह यह है: पहले स्पॉट पर समझ बनाएँ, फिर फ्यूचर्स में सबसे कम लीवरेज पर आएँ, और उतना ही लगाएँ जितना पूरा चला जाए तो भी फ़र्क़ न पड़े।

क्रिप्टो ट्रेडिंग में बड़ा जोखिम है और भारत में इस पर भारी टैक्स लगता है। यह सामान्य शैक्षिक जानकारी है — निवेश, टैक्स या क़ानूनी सलाह नहीं। मौजूदा नियम ख़ुद जाँचें और ज़रूरत हो तो योग्य सलाहकार से बात करें।

इसे व्यवहार में उतारने के लिए तैयार हैं?

जहाँ थ्योरी ख़त्म होती है वहीं से आगे बढ़ें — हमारी स्क्रीनशॉट-दर-स्क्रीनशॉट Bybit गाइड असली अकाउंट पर परखी गई हैं।

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